गर्मी में पशुओं के भाव,लागत क्यों बढ़ जाती है?
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गर्मी में पशुओं के भाव और लागत क्यों बढ़ जाती है? जानिए असली वजह!
अप्रैल का महीना शुरू होते ही हर पशुपालक के मन में एक ही सवाल उठता है — "भाईसाहब, इस बार गाय-भैंस इतनी महंगी क्यों हो गई?" या फिर "मेरी लागत हर साल गर्मी में इतनी क्यों बढ़ जाती है?" अगर आप भी यही सोचते हैं, तो आप अकेले नहीं हैं। भारत के लाखों पशुपालकों के साथ हर साल यही होता है। आइए इस ब्लॉग के माध्यम से जानते हैं इसके प्रमुख कारण:
1. हरे चारे की किल्लत — सबसे बड़ी वजह
गर्मी के मौसम में सबसे बड़ा असर हरे चारे पर पड़ता है।
मार्च से जून के बीच खेतों में हरे चारे की उपलब्धता कम हो जाती है। बरसीम, जई और अन्य हरे चारे खत्म होने लगते हैं, जिससे किसान को बाजार से महंगा चारा खरीदना पड़ता है।
उदाहरण के तौर पर:
सर्दियों में जो हरा चारा ₹2-3 प्रति किलो मिलता है, वही गर्मियों में ₹5-7 प्रति किलो तक पहुंच जाता है।
इसके अलावा भूसा, दाना और मिनरल मिक्सचर की कीमत भी बढ़ जाती है। यही कारण है कि डेयरी फार्मिंग लागत बढ़ने लगती है।
2. पानी की खपत और पानी का खर्च
गर्मी में एक स्वस्थ गाय या भैंस को सामान्य से 30-40% ज़्यादा पानी चाहिए होता है। डेयरी विशेषज्ञों के अनुसार, तापमान बढ़ने से पशुओं के शरीर में पानी की कमी (Dehydration) जल्दी होती है, जिससे दूध उत्पादन सीधे प्रभावित होता है।
जहाँ पानी की सुविधा कम है — खासकर उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान के छोटे किसानों को — वहाँ टैंकर या बोरवेल का अतिरिक्त खर्च भी जुड़ जाता है। यह छोटा लगता है, पर महीने भर में यह खर्च ₹1,000 से ₹3,000 तक आसानी से पहुँच सकता है।
3. हीट स्ट्रेस — जब पशु खाना कम कर दे
यह सबसे अनदेखी लेकिन सबसे नुकसानदेह वजह है। हीट स्ट्रेस में पशु चारा कम खाने लगते हैं, सुस्त हो जाते हैं और उनका दूध उत्पादन 10-25% तक गिर सकता है।
पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम (KVK, नोएडा) के अनुसार, तेज तापमान में पशु का पाचन तंत्र कमज़ोर पड़ जाता है। इसे संभालने के लिए पशुपालक को खास मिनरल सप्लीमेंट, इलेक्ट्रोलाइट्स और ठंडक के उपाय करने पड़ते हैं — जो सीधे लागत बढ़ाते हैं।
4. बीमारियाँ और दवाओं का खर्च
गर्मी में पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर हो जाती है। FMD (Foot and Mouth Disease), mastitis, और पेट की बीमारियाँ इसी मौसम में सबसे ज़्यादा देखने को मिलती हैं। इलाज में पशु चिकित्सक की फीस, दवाइयाँ और एंटीबायोटिक्स का खर्च जोड़ें — एक बीमार पशु आपको ₹2,000 से ₹10,000 तक का नुकसान करा सकता है।
ऊपर से अगर पशु बीमार है तो दूध बंद — यानी दोहरा घाटा।
5. शेड और कूलिंग का इंतज़ाम
अब ज़माना बदल रहा है। जागरूक पशुपालक गर्मी से पशुओं को बचाने के लिए कूलर, पंखे, स्प्रिंकलर और छाया का इंतज़ाम करते हैं। इसका खर्च भी costing में जुड़ता है।
एक छोटे डेयरी फार्म में 2 कूलर और 3 पंखे चलाने पर बिजली का बिल ₹1,500-₹2,500 प्रतिमाह अतिरिक्त आ सकता है। गर्मी के 3 महीने — यानी सीधे ₹5,000-₹7,500 बढ़ जाता है।
6. Supply कम, Demand ज़्यादा = भाव में उछाल
गर्मी में दूध उत्पादन कम होने से बाज़ार में दूध की supply घट जाती है, लेकिन demand उतनी ही रहती है। इससे दूध के दाम बढ़ते हैं — और जब दूध महंगा होता है, तो दुधारू पशुओं की market value भी बढ़ जाती है।
गर्मी में कमजोर पशु जल्दी प्रभावित हो जाते हैं, जबकि अच्छी नस्ल के healthy cattle अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करते हैं।
इस वजह से:
- HF गाय
- जर्सी क्रॉस
- मुर्रा भैंस
- हाई मिल्किंग cattle
की मांग बढ़ जाती है। यही कारण है कि गर्मियों में अच्छी दुधारू गाय या भैंस खरीदना महंगा पड़ता है।
तो क्या करें पशुपालक?
- पशुओं को सुबह-शाम ही चराएँ, दोपहर में ठंडे शेड में रखें
- 30-50 ग्राम मिनरल सप्लीमेंट रोज़ दें
- ताज़ा और साफ पानी हर समय उपलब्ध रखें
- बरसीम, ज्वार और नेपियर घास जैसे हरे चारे का स्टॉक पहले से तैयार करें
- पशु का बीमा करवाएँ ताकि अचानक नुकसान से बचाव हो
गर्मी में पशुओं के भाव और लागत का बढ़ना कोई संयोग नहीं, यह supply-demand, चारे की कमी, heat stress और बढ़ती देखरेख की लागत का मिला-जुला परिणाम है। अगर आप पहले से तैयारी करें तो इस नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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